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Tuesday, February 9, 2010

वसंत


2 comments:

  1. प्रकृति की ऑंखें अब बोझिल होकर सारे परिवर्तन को झेल रही है. मनुष्य ने प्रकृति से ऐसे छेड़छाड़ की धरती माँ हैरान है. लोग अपने घरों में बोनसाई और गमलों में फूल सजाते है पर धरती का चीरहरण कर रहे है.पर इतने अभूतपूर्व परिवर्तनों से हमे दुखी होने की बात नही है हमने जो बोया है वही काटेंगे.jyoti

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